श्री पशुपति अष्टकम || Shri Pashupati Ashtakam

       

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श्री पशुपति अष्टकम || Shri Pashupati Ashtakam

पशुपति अष्टकम अत्यधिक प्रभावशाली व शीघ्र फल देने वाला स्तोत्र हैं ! जो भी व्यक्ति पशुपति अष्टकम का नियमित रूप से 21 बार सुबह व् शाम पाठ करे व् तिल की आहुति देकर हवन करने से उसकी सारी बाधाएँ दूर हो जाती हैं ! पशुपति अष्टकम का मात्र एक बार जाप करने से मनुष्य की समस्या का अंत हो जाता हैं ! 108 बार जाप करके घी और गुग्गल से हवन में आहुति देने के बाद व्यक्ति के समस्त शत्रुओं नष्ट हो जाते हैं ! चारों तरफ सफ़लता प्राप्त होती हैं ! पशुपति अष्टकम आदि के बारे में बताने जा रहे हैं !! जय श्री सीताराम !! जय श्री हनुमान !! जय श्री दुर्गा माँ !! यदि आप अपनी कुंडली दिखा कर परामर्श लेना चाहते हो तो या किसी समस्या से निजात पाना चाहते हो तो कॉल करके या नीचे दिए लाइव चैट ( Live Chat ) से चैट करे साथ ही साथ यदि आप जन्मकुंडली, वर्षफल, या लाल किताब कुंडली भी बनवाने हेतु भी सम्पर्क करें : 9667189678 Shri Pashupati Ashtakam By Online Specialist Astrologer Acharya Pandit Lalit Trivedi.

श्री पशुपति अष्टकम || Shri Pashupati Ashtakam

ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतसं
रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् ।

पद्मासीनं समन्तात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं
विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥ १ ॥

पशुपतिं द्युपतिं धरणीपतिं भुजगलोकपतिं च सतीपतिम् ।
प्रणतभक्तजनार्तिहरं परं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ २ ॥

न जनको जननी न च सोदरो न तनयो न च भूरिबलं कुलम् ।
अवति कोऽपि न कालवशं गतं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ३ ॥

मुरजडिण्डिमवाद्यविलक्षणं मधुरपञ्चमनादविशारदम् ।
प्रमथभूतगणैरपि सेवितं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ४ ॥

शरणदं सुखदं शरणान्वितं शिव शिवेति शिवेति नतं नृणाम् ।
अभयदं करुणावरुणालयं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ५ ॥

नरशिरोरचितं मणिकुण्डलं भुजगहारमुदं वृषभध्वजम् ।
चितिरजोधवलीकृतविग्रहं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ६ ॥

मखविनाशकरं शशिशेखरं सततमध्वरभाजिफलप्रदम् ।
प्रलयदग्धसुरासुरमानवं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ७ ॥

मदमपास्य चिरं हृदिसंस्थितं मरणजन्मजराभयपीडनम् ।
जगदुदीक्ष्य समीपभयाकुलं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ८ ॥

हरिविरिञ्चिसुराधिपपूजितं यमजनेशधनेशनमस्कृतम् ।
त्रिनयनं भुवनत्रितयाधिपं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ९ ॥

पशुपतेरिदमष्टकमद्भुतं विरचितं पृथिवीपतिसूरिणा ।
पठति संशृणुते मनुजः सदा शिवपुरीं वसते लभते मुदम् ॥ १० ॥

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