Shri Ganesh Ashtottara Satanama Stotram || श्री गणेश अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र

       

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श्री गणेश अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र || Shri Ganesh Ashtottara Satanama Stotram

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श्री गणेश अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र || Shri Ganesh Ashtottara Satanama Stotram

गणेशहेरंबगजाननेति महोदर! स्वानुभवप्रकाशिन्!।

वरिष्ठ! सिद्धिप्रिय!  बुद्धिनाथ! वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥१॥

अनेकविघ्नान्तक! वक्रतुण्ड! स्वसंज्ञवासिंश्चतुर्भुजेति ।

कवीश देवान्तकनाशकारिन् वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥२॥

महेशसूनो गजदैत्यशत्रो वरेण्यसूनो विकटत्रिनेत्र ।

परेश पृथ्वीधर! एकदन्त ! वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥३॥

प्रमोदमोदेति नरान्तकारे षडूर्मिहन्तर्गजकर्ण डुण्ढे!

द्वन्द्वारिसिन्धो स्थिरभावकरिन् ! वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥४॥

विनायक ज्ञानविघातशत्रो पराशरस्यात्मज! विष्णुपुत्र ।

अनादिपूज्याखुग सर्वपूज्य वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥५॥

विद्येज्य लंबोदर धूम्रवर्ण मयूरपालेति मयूरवाहिन्।

सुरासुरैः सेवितपादपद्म! वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥६॥

वरिन्महाखुध्वज! शूर्पकर्ण! शिवाजसिंहस्थ अनन्तवाह।

दितौज विघ्नेश्वर शेषनाभे वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥७॥

अणोरणीयो महतोमहीयो रवेर्ज योगेशज ज्येष्ठराज!

निधीश मन्त्रे शच शेषपुत्र! वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥८॥

वरप्रदातरदितेश्च सूनो परात्पर ज्ञानद तारवक्त्र।

गुहाग्रज ब्रह्मप पार्श्वपुत्र वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥९॥

सिन्धोश्च शत्रो! परशुप्रपाणे! शमीश! पुष्पप्रिय! विघ्नहारिन्।

दूर्वाभरैरर्चित! देवदेव! वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥१०॥

धियःप्रदातश्च शमिप्रियेति सुसिद्धिदातश्च सुशान्तिदातः!।

अमेयमायाऽमितविक्रमेति वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥११॥

द्विधाचतुर्थिप्रिय!  कश्यपाज्ज! धनप्रद! ज्ञानपदप्रकाश!  ।

चिन्तामणे! चित्तविहारकारिन्! वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥१२॥

यमस्य शत्रो! अभिमान शत्रो! विधेर्ज! हन्तः! कपिलस्य सूनो!।

विदेह! स्वानन्द! अयोगयोग! वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥१३॥

गणस्य शत्रो कमलस्य शत्रो! समस्तभावज्ञ! च फालचन्द्र!।

अनादिमध्यान्तमय प्रचारिन्! वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥१४॥

विभो जगद्रूप!  गणेश!  भूमन्! पुष्टेःपते!  आखुगतेति बोद्धः

कर्तश्च पातुश्च तु संहरेति वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ॥१५॥

इदमष्टोत्तरशतं नाम्ना तस्य पठन्ति ये।

शृण्वन्ति वा तेषु भीतः कुरुध्वं मा प्रवेशनम्॥१६॥

भुक्तिमुक्तिप्रदं डुण्ढेर्धनधान्यप्रवर्धनम्।

ब्रह्मभूयकरं स्तोत्रं जपन्तं नित्यमादरात् ॥१७॥

यत्र कुत्र गणेशस्य चिह्नयुक्तानि वै भटाः।

धामानि तत्र संभीताः कुरुध्वं मा प्रवेशनम्॥१८॥

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