श्री बटुक भैरव अष्टोत्तर शतनामावली स्तोत्रम् || Shri Batuk Bhairav Ashtottara Shatanamavali Stotram || Batuk Bhairav Ashtottara Shatanamavali Stotra

       

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श्री बटुक भैरव अष्टोत्तर शतनामावली स्तोत्रम् || Shri Batuk Bhairav Ashtottara Shatanamavali Stotram || Batuk Bhairav Ashtottara Shatanamavali Stotra

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श्री बटुक भैरव अष्टोत्तर शतनामावली स्तोत्रम् || Shri Batuk Bhairav Ashtottara Shatanamavali Stotram || Batuk Bhairav Ashtottara Shatanamavali Stotra

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥

॥ श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः ॥

॥ श्रीगुरवे नमः ॥

॥ श्रीभैरवाय नमः ॥

ॐ अस्य श्रीबटुकभैरवस्तोत्रमन्त्रस्य कालग्निरुद्र ऋषिः ।

अनुष्टुप् छन्दः । आपदुद्धारकबटुकभैरवो देवता ।

ह्रीं बीजम् । भैरवीवल्लभः शक्तिः ।

नीलवर्णो दण्डपाणिरिति कीलकम् ।

समस्तशत्रुदमने समस्तापन्निवारणे सर्वाभीष्टप्रदाने च विनियोगः ॥

॥ ऋष्यादि न्यासः ॥

ॐ कालाग्निरुद्र ऋषये नमः शिरसि ।

अनुष्टुप्छन्दसे नमः मुखे ।

आपदुद्धारकश्रीबटुकभैरव देवतायै नमः हृदये ।

ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये । भैरवीवल्लभ शक्तये नमः पादयोः ।

नीलवर्णो दण्डपाणिरिति कीलकाय नमः नाभौ ।

समस्तशत्रुदमने समस्तापन्निवारणे सर्वाभीष्टप्रदाने विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।

॥ इति ऋष्यादि न्यासः ॥

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॥ अथ मूलमन्त्रः ॥

॥ ॐ ह्रीं वां बटुकाय क्ष्रौं क्षौ आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रां बटुकाय स्वाहा ॥

॥ इति मूलमन्त्रः ॥

॥ अथ ध्यानम् ॥

नीलजीमूतसङ्काशो जटिलो रक्तलोचनः ।

दंष्ट्राकरालवदनः सर्पयज्ञोपवीतवान् ॥

दंष्ट्रायुधालंकृतश्च कपालस्रग्विभूषितः ।

हस्तन्यस्तकरोटीको भस्मभूषितविग्रहः ॥

नागराजकटीसूत्रो बालमूर्ति दिगम्बरः ।

मञ्जु सिञ्जानमञ्जरी पादकम्पितभूतलः ॥

भूतप्रेतपिशाचैश्च सर्वतः परिवारितः ।

योगिनीचक्रमध्यस्थो मातृमण्डलवेष्टितः ॥

अट्टहासस्फुरद्वक्त्रो भ्रुकुटीभीषणाननः ।

भक्तसंरक्षणार्थाय दिक्षुभ्रमणतत्परः ॥

॥ इति ध्यानम् ॥

अथ स्तोत्रम् ।

ॐ ह्रीं बटुको वरदः शूरो भैरवः कालभैरवः ।

भैरवीवल्लभो भव्यो दण्डपाणिर्दयानिधिः ॥ १॥

वेतालवाहनो रौद्रो रुद्रभ्रुकुटिसम्भवः ।

कपाललोचनः कान्तः कामिनीवशकृद्वशी ॥ २॥

आपदुद्धारणो धीरो हरिणाङ्कशिरोमणिः ।

दंष्ट्राकरालो दष्टोष्ठौ धृष्टो दुष्टनिबर्हणः ॥ ३॥

सर्पहारः सर्पशिराः सर्पकुण्डलमण्डितः ।

कपाली करुणापूर्णः कपालैकशिरोमणिः ॥ ४॥

श्मशानवासी मांसाशी मधुमत्तोऽट्टहासवान् ।

वाग्मी वामव्रतो वामो वामदेवप्रियङ्करः ॥ ५॥

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वनेचरो रात्रिचरो वसुदो वायुवेगवान् ।

योगी योगव्रतधरो योगिनीवल्लभो युवा ॥ ६॥

वीरभद्रो विश्वनाथो विजेता वीरवन्दितः ।

भृतध्यक्षो भूतिधरो भूतभीतिनिवारणः ॥ ७॥

कलङ्कहीनः कङ्काली क्रूरकुक्कुरवाहनः ।

गाढो गहनगम्भीरो गणनाथसहोदरः ॥ ८॥

देवीपुत्रो दिव्यमूर्तिर्दीप्तिमान् दीप्तिलोचनः ।

महासेनप्रियकरो मान्यो माधवमातुलः ॥ ९॥

भद्रकालीपतिर्भद्रो भद्रदो भद्रवाहनः ।

पशूपहाररसिकः पाशी पशुपतिः पतिः ॥ १०॥

चण्डः प्रचण्डचण्डेशश्चण्डीहृदयनन्दनः ।

दक्षो दक्षाध्वरहरो दिग्वासा दीर्घलोचनः ॥ ११॥

निरातङ्को निर्विकल्पः कल्पः कल्पान्तभैरवः ।

मदताण्डवकृन्मत्तो महादेवप्रियो महान् ॥ १२॥

खट्वाङ्गपाणिः खातीतः खरशूलः खरान्तकृत् ।

ब्रह्माण्डभेदनो ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मणपालकः ॥ १३॥

दिग्चरो भूचरो भूष्णुः खेचरः खेलनप्रियः ।

दिग्चरो सर्वदुष्टप्रहर्ता च सर्वरोगनिषूदनः ।

सर्वकामप्रदः शर्वः सर्वपापनिकृन्तनः ॥ १४॥

इत्थमष्टोत्तरशतं नाम्नां सर्वसमृद्धिदम् ।

आपदुद्धारजनकं बटुकस्य प्रकीर्तितम् ॥ १५॥

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एतच्च शृणुयान्नित्यं लिखेद्वा स्थापयेद्गृहे ।

धारयेद्वा गले बाहौ तस्य सर्वा समृद्धयः ॥ १६॥

न तस्य दुरितं किञ्चिन्न चोरनृपजं भयम् ।

न चापस्मृतिरोगेभ्यो डाकिनीभ्यो भयं न हि ॥ १७॥

न कूष्माण्डग्रहादिभ्यो नापमृत्योर्न च ज्वरात् ।

मासमेकं त्रिसन्ध्यं तु शुचिर्भूत्वा पठेन्नरः ॥ १८॥

सर्वदारिद्र्यनिर्मुक्तो निधिं पश्यति भूतले ।

मासद्वयमधीयानः पादुकासिद्धिमान् भवेत् ॥ १९॥

अञ्जनं गुटिका खड्गं धातुवादरसायनम् ।

सारस्वतं च वेतालवाहनं बिलसाधनम् ॥ २०॥

कार्यसिद्धिं महासिद्धिं मन्त्रं चैव समीहितम् ।

वर्षमात्रमधीयानः प्राप्नुयात्साधकोत्तमः ॥ २१॥

एतत्ते कथितं देवि गुह्याद्गुह्यतरं परम् ।

कलिकल्मषनाशनं वशीकरणं चाम्बिके ॥ २२॥

॥ इति कालसङ्कर्षणतन्त्रोक्त श्रीबटुकभैरवाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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