हनुमान कृतं श्री देवी स्तोत्रम || Hanuman Krutham Sri Devi Stotram || Sri Devi Stotram

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अम्ब प्रसीद वरदा भव दुःखहन्त्री कामान् ममाशु परिपूरय कामधेनो

अद्यैव मे रिपुगणा विलयं प्रयान्तु वीर्यं जयं च विपुलं च यशः प्रदेहि ॥१॥

अंब प्रसीद महतीं श्रियमत्र लोके सर्वाधिकां  वितरतीमितरानपेक्षम्

संपत्करीं सुखकरीं भवतीमुपास्ते यस्तस्य दुर्लभमिह त्रिदिवेऽपि नास्ति ॥२॥

अंब प्रसीद शतकोटिधरादिदेव-सम्भावितांघ्रियुगले सकलेष्टदात्री ।

यस्मिन् प्रसीदति मनाग्भवती भवानी धन्यः स एव जगतां च स एव सेव्यः ॥३॥

अंब प्रसीद सकृदंबुजनाभवक्षः-क्रीडागृहे कमलवासिनि हेमवर्णे।

संपत्तिकल्पलतिके त्वदपांगरेखां ब्रह्मादयोऽपि परिगृह्य भवन्ति धन्याः ॥४॥

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अंब प्रसीद शशिखण्डविभूषणांग-भागस्थिते भवनिहन्त्रि मनोन्मनि त्वम्।

या भाति विश्वविलयस्थितिसृष्टिदात्री विश्वंभरादिमहदादिविचित्ररूपा  ॥५॥

अंब प्रसीद चतुराननवक्त्रपद्म-राजीविहारपरिशीलनराजहंसि ।

दृष्टस्त्वया सदयमत्र भवेत् स मर्त्यः मूकोऽपि पण्डिततमः स जडोऽपि धीरः॥६॥

अंब प्रसीद शतमन्युमुखामरात्म-शक्ते त्वदंघ्रिशरणस्य गृहाङ्गणेषु ।

खेलन्ति सुन्दरदृशो विचरन्ति विप्राः सीदन्ति भूमिपतयोऽवसरप्रतीक्षाः ॥७॥

अंब प्रसीद चतुरंगबलावलेप-दूरीकृतारिनिवहो भवतीप्रसादात्।

दीनोप्यनन्यसुलभान् सकलांश्च कामान् लब्ध्वा चिरम् विजयते हि सदारपुत्रः ॥८॥

अंब प्रसीद सहसा मयि पक्षपातात् कष्टां दशां मम निरीक्ष्य परानपोह्याम्।

नो चेत् गतिर्जगति नास्ति निरस्तखेदैः संसेव्यमानचरणांबुरुहे मुनीन्द्रैः ॥९॥

अंब प्रसीद झटिति त्वमुपेक्षसे किं वत्सस्य वाग्विलसतः श्रवणातुरा चेत्।

उत्संगसंगिनि शिशौ वचनप्रतीक्षा स्तन्यं निपीय मुदिते तु सुखाय मातुः ॥१०॥

अंब प्रसीद दयया त्वरितं भवानी जानासि चेत् हृदयशल्यमिहाविषह्यम्।

नो चेत् कथं नु भवती जगतां शरण्या भूयाच्चिराय भवतापसमाश्रितानाम् ॥११॥

अंब प्रसीद जहि शत्रुगणानिमांस्त्वम् अद्यैव देवि परिवर्धय कौतुकं मे।

कोऽयं विलंब इह सा क्व गता दया ते दीनावनव्रतमिदं तव किं समाप्तम् ॥१२॥

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अंब प्रसीद यदि भृत्यविधेयतायाः साक्षात्भवानि भवतीह जनस्य लक्ष्यम्।

कारुण्यपात्रमिममाकलयन्त्यजस्रं धन्य़ं विधातुमखिलस्य जनस्य मान्यम् ॥१३॥

अंब प्रसीद नियतं क्रियतां भवत्या देवारिवर्गवनपावकतां दधत्या।

अस्य प्रमादविवशस्य मनाक् प्रसादः सर्वात्मना यदगतिर्यदनन्यनाथः ॥१४॥

अंब प्रसीद मदनुग्रहसत्वरेण चित्तेन विग्रहवतेव दयाभरेण।

आलक्ष्य माममृतशीतलया च दृष्ट्या क्षिप्रं विधेहि परिरंभितभूरिभाग्यम् ॥१५॥

अंब प्रसीद किमनेन विलंबनेन कार्या त्वरा न हि विलंबमवेक्षते हि।

यद्भागधेयमिह ते सुरलोभनीयं सर्वात्मना गिरिसुते त्वदधीन एव ॥१६॥

अंब प्रसीद परमेण समाधिना मां एकान्तभक्तमवधार्य च चण्डिके त्वं।

सौभाग्यसंपदभिपूरमहालवालं उद्वेलवीर्यनिलयं कुरु भूरिभाग्यम् ॥१७॥

इति स्तुतवति मारुतौ निहतचण्डमुण्डासुरा सुरासुरनरोरगाद्यखिललोकधात्री शिवा।

महामहिषमर्दिनी समवलंब्य दिव्यं वपुः पुरः समभवत्तदा पुरुषमात्र साम्राज्यदा ॥१८॥

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