अरुणाचल पञ्चरत्नम् || Arunachala Pancharatnam

       

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अरुणाचल पञ्चरत्नम् || Arunachala Pancharatnam

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अरुणाचल पञ्चरत्नम् || Arunachala Pancharatnam

करुणापूर्णसुधाब्धे कबलितघनविश्वरूप किरणावल्या।

अरुणाचल परमात्मन् अरुणो भव चित्तकञ्जसुविकासाय ॥१॥

त्वय्यरुणाचल सर्वं भूत्वा स्थित्वा प्रलीनमेतच्चित्रम्।

हृद्यहमित्यात्मतया नृत्यसि भोस्ते वदन्ति हृदयं नाम ॥२॥

अहमिति कुत आयाती-त्यन्विष्यान्तः प्रविष्टयात्यमलधिया।

अवगम्य स्वं रूपं शाम्यत्यरुणाचल त्वयि नदीवाब्धौ॥३॥

त्यक्त्वा विषयं बाह्यं रुद्धप्राणेन रुद्धमनसान्तस्त्वाम्।

ध्यायन् पश्यति योगी दीधितिमरुणाचल त्वयि महीयन्ते ॥४॥

त्वय्यर्पितमनसा त्वां पश्यन् सर्वं तवाकृतितया सततम्।

भजतेऽनन्य प्रीत्या स जयत्यरुणाचल त्वयि सुखे मग्नः॥५॥

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