नर्मदा अष्टक ( Narmada Ashtak ) Shri Narmada Ashtakam

       

नर्मदा अष्टक [ Narmada Ashtak & Shri Narmada Ashtakam ] 

नर्मदा अष्टक के लाभ : narmada ashtak ke labh : नर्मदा नदी केवल नदी मात्र ही नही अपितु हमारे भारत में गंगा नदी के समान आस्था व विश्वास का प्रतीक है, इसे हमारे भारत वर्ष में जीवनदायिनी नदी कहते है, इसलिए नर्मदा नदी के जल का निर्मल एवं अविरल बहते रहना अत्यंत आवश्यक है, इसका संरक्षण किया जाना जरूरी है ! नर्मदा नदी का पौराणिक, आध्यात्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक महत्व होने के कारण इसके संरक्षण में भारतीय सरकार के साथ-साथ संत समाज और समाज के लोगों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है ! नर्मदा अष्टक, narmada ashtak in hindi, shri narmada ashtakam in hindi, श्री नर्मदा अष्टक, नर्मदा अष्टक के फ़ायदे, narmada ashtak ke fayde in hindi, नर्मदा अष्टक के लाभ, narmada ashtak ke labh in hindi, narmada ashtak benefits in hindi, narmada ashtak in sanskrit, shri narmada ashtakam in hindi, narmada ashtak mp3 download, narmada ashtak lyrics in hindi, narmada ashtak pdf in hindi आदि के बारे में बताने जा रहे हैं !! जय श्री सीताराम !! जय श्री हनुमान !! जय श्री दुर्गा माँ !! यदि आप अपनी कुंडली दिखा कर परामर्श लेना चाहते हो तो या किसी समस्या से निजात पाना चाहते हो तो कॉल करके या नीचे दिए लाइव चैट ( Live Chat ) से चैट करे साथ ही साथ यदि आप जन्मकुंडली, वर्षफल, या लाल किताब कुंडली भी बनवाने हेतु भी सम्पर्क करें : 7821878500 narmada ashtak by acharya pandit lalit sharma 

नर्मदा अष्टक !! narmada ashtak in hindi

सबिन्दुसिन्धुसुस्खलत्तरङ्गभङ्गरञ्जितं द्विषत्सु पापजातजातकारिवारिसंयुतम्।

कृतान्तदूतकालभूतभीतिहारिवर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥1॥

त्वदम्बुलीनदीनमीनदिव्यसम्प्रदायकं कलौ मलौघभारहारि सर्वतीर्थनायकम्।

सुमच्छकच्छनक्रचक्रचक्रवाकशर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥2॥

महागभीरनीरपूरपापधूतभूतलं ध्वनत्समस्तपातकारिदारितापदाचलम्।

जगल्लये महाभये मृकण्डसूनुहर्म्यदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥3॥

गतं तदैव मे भवं त्वदम्बुवीक्षितं यदा मृकण्डसूनुशौनकासुरारिसेवि सर्वदा।

पुनर्भवाब्धिजन्मजं भवाब्धिदुःखवर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥4॥

अलक्षलक्षकिन्नरामरासुरादिपूजितं सुलक्षनीरतीरधीरपक्षिलक्षकूजितम्।

वसिष्ठसिष्टपिप्पलादिकर्दमादिशर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥5॥

सनत्कुमारनाचिकेतकश्यपादिषट्पदैः धृतं स्वकीयमानसेषु नारदादिषट्पदैः।

रवीन्दुरन्तिदेवदेवराजकर्मशर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥6॥

अलक्षलक्षलक्षपापलक्षसारसायुधं ततस्तु जीवजन्तुतन्तुभुक्तिमुक्तिदायकम्।

विरञ्चिविष्णुशङ्करस्वकीयधामवर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥7॥

अहोऽमृतं स्वनं श्रुतं महेशकेशजातटे किरातसूतवाडवेषु पण्डिते शठे नटे।

दुरन्तपापतापहारिसर्वजन्तुशर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥8॥

इदं तु नर्मदाष्टकं त्रिकालमेव ये सदा पठन्ति ते निरन्तरं न यान्ति दुर्गतिं कदा।

सुलभ्य देहदुर्लभं महेशधामगौरवं पुनर्भवा नरा न वै विलोकयन्ति रैरवम्॥9॥

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