महाविद्या मातंगी कवच ( Mahavidya Matangi Kavach ) Matangi Kavacham

       

महाविद्या मातंगी कवच [ Mahavidya Matangi Kavach & Matangi Kavacham ]

महाविद्या मातंगी कवच के फ़ायदे : mahavidya matangi kavach ke fayde : यह तो आप सब जानते है की मातंगी महाविद्या दस महाविद्याओं में नवेँ स्थान की साधना मानी जाती हैं ! मातंगी कवच पढ़ने से साधक वाक् सिद्धि, संगीत तथा अन्य ललित कलाओं में निपुण हो जाता हैं ! मातंगी कवच पढ़ने से साधक के जीवन में सुख-सौभाग्य, कीर्ति, आयु, धन, आदि सुख भोगता है उसके जीवन कभी भी प्रेम की कमी नहीं रहती हैं !! जय श्री सीताराम !! जय श्री हनुमान !! जय श्री दुर्गा माँ !! जय श्री मेरे पूज्यनीय माता – पिता जी !! यदि आप अपनी कुंडली दिखा कर परामर्श लेना चाहते हो तो या किसी समस्या से निजात पाना चाहते हो तो कॉल करके या नीचे दिए लाइव चैट ( Live Chat ) से चैट करे साथ ही साथ यदि आप जन्मकुंडली, वर्षफल, या लाल किताब कुंडली भी बनवाने हेतु भी सम्पर्क करें Mobile & Whats app Number : 7821878500 mahavidya matangi kavach by acharya pandit lalit sharma

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मातंगी महाविद्या कवच !! matangi mahavidya kavach in hindi

श्री देव्युवाच

साधु-साधु महादेव। कथयस्व सुरेश्वर।

मातंगी-कवचं दिव्यं, सर्व-सिद्धि-करं नृणाम् ॥

श्री ईश्वर उवाच

श्रृणु देवि। प्रवक्ष्यामि, मातंगी-कवचं शुभं।

गोपनीयं महा-देवि। मौनी जापं समाचरेत् ॥

विनियोग –

ॐ अस्य श्रीमातंगी-कवचस्य श्री दक्षिणा-मूर्तिः ऋषिः । विराट् छन्दः । श्रीमातंगी देवता । चतुर्वर्ग-सिद्धये जपे विनियोगः ।

ऋष्यादि-न्यास

श्री दक्षिणा-मूर्तिः ऋषये नमः शिरसि ।

विराट् छन्दसे नमः मुखे ।

श्रीमातंगी देवतायै नमः हृदि ।

चतुर्वर्ग-सिद्धये जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।

मूल कवच-स्तोत्र

ॐ शिरो मातंगिनी पातु, भुवनेशी तु चक्षुषी ।

तोडला कर्ण-युगलं, त्रिपुरा वदनं मम ॥

पातु कण्ठे महा-माया, हृदि माहेश्वरी तथा ।

त्रि-पुष्पा पार्श्वयोः पातु, गुदे कामेश्वरी मम ॥

ऊरु-द्वये तथा चण्डी, जंघयोश्च हर-प्रिया ।

महा-माया माद-युग्मे, सर्वांगेषु कुलेश्वरी ॥

अंग प्रत्यंगकं चैव, सदा रक्षतु वैष्णवी ।

ब्रह्म-रन्घ्रे सदा रक्षेन्, मातंगी नाम-संस्थिता ॥

रक्षेन्नित्यं ललाटे सा, महा-पिशाचिनीति च ।

नेत्रयोः सुमुखी रक्षेत्, देवी रक्षतु नासिकाम् ॥

महा-पिशाचिनी पायान्मुखे रक्षतु सर्वदा ।

लज्जा रक्षतु मां दन्तान्, चोष्ठौ सम्मार्जनी-करा ॥

चिबुके कण्ठ-देशे च, ठ-कार-त्रितयं पुनः ।

स-विसर्ग महा-देवि । हृदयं पातु सर्वदा ॥

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मांगलिक दोष निवारण || Mangal Dosha Nivaran

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नाभि रक्षतु मां लोला, कालिकाऽवत् लोचने ।

उदरे पातु चामुण्डा, लिंगे कात्यायनी तथा ॥

उग्र-तारा गुदे पातु, पादौ रक्षतु चाम्बिका ।

भुजौ रक्षतु शर्वाणी, हृदयं चण्ड-भूषणा ॥

जिह्वायां मातृका रक्षेत्, पूर्वे रक्षतु पुष्टिका ।

विजया दक्षिणे पातु, मेधा रक्षतु वारुणे ॥

नैर्ऋत्यां सु-दया रक्षेत्, वायव्यां पातु लक्ष्मणा ।

ऐशान्यां रक्षेन्मां देवी, मातंगी शुभकारिणी ॥

रक्षेत् सुरेशी चाग्नेये, बगला पातु चोत्तरे ।

ऊर्घ्वं पातु महा-देवि । देवानां हित-कारिणी ॥

पाताले पातु मां नित्यं, वशिनी विश्व-रुपिणी ।

प्रणवं च ततो माया, काम-वीजं च कूर्चकं ॥

मातंगिनी ङे-युताऽस्त्रं, वह्नि-जायाऽवधिर्पुनः ।

सार्द्धेकादश-वर्णा सा, सर्वत्र पातु मां सदा ॥

फल-श्रुति

इति ते कथितं देवि । गुह्यात् गुह्य-तरं परमं ।

त्रैलोक्य-मंगलं नाम, कवचं देव-दुर्लभम् ॥

यः इदं प्रपठेत् नित्यं, जायते सम्पदालयं ।

परमैश्वर्यमतुलं, प्राप्नुयान्नात्र संशयः ॥

गुरुमभ्यर्च्य विधि-वत्, कवचं प्रपठेद् यदि ।

ऐश्वर्यं सु-कवित्वं च, वाक्-सिद्धिं लभते ध्रुवम् ॥

नित्यं तस्य तु मातंगी, महिला मंगलं चरेत् ।

ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च, ये देवा सुर-सत्तमाः ॥

ब्रह्म-राक्षस-वेतालाः, ग्रहाद्या भूत-जातयः ।

तं दृष्ट्वा साधकं देवि । लज्जा-युक्ता भवन्ति ते ॥

कवचं धारयेद् यस्तु, सर्वां सिद्धि लभेद् ध्रुवं ।

राजानोऽपि च दासत्वं, षट्-कर्माणि च साधयेत् ॥

सिद्धो भवति सर्वत्र, किमन्यैर्बहु-भाषितैः ।

इदं कवचमज्ञात्वा, मातंगीं यो भजेन्नरः ॥

झल्पायुर्निधनो मूर्खो, भवत्येव न संशयः ।

गुरौ भक्तिः सदा कार्या, कवचे च दृढा मतिः ॥

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