देवी सूक्त ( Devi Suktam ) Tantroktam Devi Suktam

       

देवी सूक्त [ Devi Suktam & Tantroktam Devi Suktam ] 

देवी सूक्त के लाभ : devi suktam ke labh : देवी सूक्त का नियमित पाठ करने से देवी माँ की कृपा प्राप्ति व आशीर्वाद की प्राप्ति होती हैं ! देवी सूक्तम् ऋग्वेद वेद का एक मंत्र है जिसे अम्भ्राणी सूक्तम् भी कहते हैं, इसमें 8 श्लोक हैं । देवी सूक्त का पाठ शुक्रवार के दिन करने से व्यक्ति के घर-परिवार को किसी समस्या और मुसीबतें का सामना नहीं करना पड़ता हैं ! देवी सूक्त, devi suktam in hindi, tantroktam devi suktam in hindi, देवी सूक्तम, देवी सूक्त के फ़ायदे, devi suktam ke fayde in hindi, देवी सूक्त के लाभ, devi suktam ke labh in hindi, devi suktam benefits in hindi, tantroktam devi suktam in sanskrit, shri suktam stotra in hindi, devi suktam mp3 download, devi suktam lyrics in hindi, devi suktam pdf in hindi आदि के बारे में बताने जा रहे हैं !! जय श्री सीताराम !! जय श्री हनुमान !! जय श्री दुर्गा माँ !! यदि आप अपनी कुंडली दिखा कर परामर्श लेना चाहते हो तो या किसी समस्या से निजात पाना चाहते हो तो कॉल करके या नीचे दिए लाइव चैट ( Live Chat ) से चैट करे साथ ही साथ यदि आप जन्मकुंडली, वर्षफल, या लाल किताब कुंडली भी बनवाने हेतु भी सम्पर्क करें : 7821878500 devi suktam by acharya pandit lalit sharma 

देवी सूक्त !! devi suktam in hindi

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मांगलिक दोष निवारण || Mangal Dosha Nivaran

दी गई YouTube Video पर क्लिक करके मांगलिक दोष के उपाय || Manglik Dosh Ke Upay बहुत आसन तरीके से सुन ओर देख सकोगें !

अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्र्चराम्यहमादित्यैरुत विश्र्वदेवैः।

अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्र्विनोभा॥1॥अहं सो

ममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम्।

अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते॥2॥

अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्।

तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम्॥3॥

मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणितियईं श्रृणोत्युक्तम्।

अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि॥4॥

अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः।

यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्॥5॥

अहं रुद्राय धनुरा तनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ।

अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश॥6॥

अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे।

ततो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वोतामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि॥7॥

अहमेव वात इव प्र वाम्यारभमाणा भुवनानि विश्र्वा।

परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना सं बभूव॥8॥

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